Monday, August 13, 2018

जब कास्त्रो ने इंदिरा गांधी को छाती से लगा लिया

बात 1960 की है. मौका था संयुक्त राष्ट्र संघ की पंद्रहवी वर्षगांठ का. दुनिया भर के चोटी के नेता न्यूयॉर्क में जमा हुए थे. जब फ़िदेल कास्त्रो न्यूयार्क पहुंचे तो ये जान कर उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा कि वहाँ का कोई होटल उन्हें अपने यहाँ रखने के लिए तैयार नहीं है.
एक दिन तो वो क्यूबा के दूतावास में रहे लेकिन अगले दिन उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरशोल्ड से मुलाक़ात कर कहा कि ये आप की ज़िम्मेदारी है कि मेरे और मेरे प्रतिनिधिमंडल के रहने का इंतज़ाम करें वर्ना मैं संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के प्रांगण में तंबू डाल कर वहाँ रहने लगूंगा. ग़नीमत ये रही कि अगले दिन न्यूयार्क का टेरेसा होटल उन्हें अपने यहाँ रखने के लिए तैयार हो गया.
भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने बीबीसी के बताया कि जब मैं कास्त्रो से मिला तो उन्होंने मुझसे कहा, "क्या आप को पता है कि जब मैं न्यूयॉर्क के उस होटल में रुका तो सबसे पहले मुझसे मिलने कौन आया? महान जवाहरलाल नेहरू. मेरी उम्र उस समय 34 साल थी. अंतरराष्ट्रीय राजनीति का कोई तजुर्बा नहीं था मेरे पास. नेहरू ने मेरा हौसला बढ़ाया जिसकी वजह से मुझमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास जगा. मैं ताउम्र नेहरू के उस एहसान को नहीं भूल सकता."
नेहरू और फ़िडेल की उस मुलाक़ात के बाद भारत के लिए उनकेन में जो सम्मान और स्नेह पैदा हुआ उसमें कभी कमी नहीं आई. 1983 में जब भारत में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन हुआ तो फ़िदेल कास्त्रो यहाँ आए. सम्मेलन की शुरुआत में ही फ़लस्तीनी नेता यासर अराफ़ात इस बात पर नाराज़ हो गए कि उनसे पहले जॉर्डन के शाह को भाषण देने का मौक़ा दिया गया. भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह उस सम्मेलन के सेक्रेट्री जनरल थे.
नटवर कहते हैं, "उस सम्मेलन में सुबह के सत्र में फ़िदेल कास्त्रो अध्यक्ष थे. उसके बाद इंदिरा गांधी अध्यक्ष बन गईं थीं. सुबह के सत्र के बाद मेरे डिप्टी सत्ती लांबा मेरे पास दौड़े हुए आए और बोले बहुत बड़ी आफ़त आ गई है. यासेर अराफ़ात बहुत नाराज़ हैं और तुरंत ही अपने विमान से वापस जाना चाहते हैं. मैंने इंदिरा जी को फ़ोन किया और कहा कि आप फ़ौरन विज्ञान भवन आ जाइए और अपने साथ फ़िदेल कास्त्रो को भी लेते आइए."
नटवर आगे बताते हैं, "कास्त्रो साहब आए और उन्होंने फ़ोन कर यासर अराफ़ात को भी बुला लिया. उन्होंने अराफ़ात से पूछा आप इंदिरा गाँधी को अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं. अराफ़ात ने कहा, दोस्त नहीं... वो मेरी बड़ी बहन हैं. इस पर कास्त्रो ने तपाक से कहा तो फिर छोटे भाई की तरह बरताव करो और सम्मेलन में भाग लो." अराफ़ात इंदिरा गांधी और फ़िदेल को मना नहीं कर पाए और शाम के सत्र में भाग लेने के लिए पहुंच गए.
इसी सम्मेलन के उस दृश्य को कौन भूल सकता है जब फ़िदेल कास्त्रो ने विज्ञान भवन के मंच पर ही सरेआम इंदिरा गाँधी को गले लगा लिया था. मशहूर पत्रकार सईद नक़वी कहते हैं, "इंदिरा गांधी को फ़िदेल ने छाती से लगा लिया. वो लजाई शर्माई दुल्हन बन गईं बिल्कुल. उनकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें. लेकिन वो इंदिरा को नेहरू की बेटी के रूप में देखते थे."
सईद नक़वी को 1990 में फ़िदेल कास्त्रो से इंटरव्यू करने का मौका मिला था. नक़वी याद करते हैं, "बड़ी मुश्किल से इंटरव्यू देने के लिए वो राज़ी हुए. हम क्यूबा पहुंचे. वहाँ पर हमेशा संस्पेंस रहता है. वो आपको कमरे में बैठा लेते हैं और फिर कहते हैं कि आप बाहर नहीं जा सकते हैं क्योंकि फ़िदेल के दफ़्तर से किसी समय भी फ़ोन आ सकता है. फिर मुझसे रात में तैयार रहने के लिए कहा गया. मैं समझा कि शरीफ़ आदमी छह या सात या बहुत हुआ आठ बजे बुलाएगा."
नक़वी आगे बताते हैं, "लेकिन उन्होंने मुझे रात दस बजे बुलाया. उनकी गाड़ी आई मुझे लेने. वहां भी एक साइड रूम में हम बैठे. घंटे भर बाद कास्त्रो प्रकट हुए. मैं समझा कि वो मुझे सिगार पेश करेंगे. लेकिन पता चला कि उन्होंने सिगार पीना छोड़ दिया था. उन्होंने एक ब्रांडी अपने लिए बनाई और एक मेरे लिए. वो ग़ोया इसके ज़रिए मुझसे रैपो कायम करने की कोशिश कर रहे थे. डेढ़ घंटे शुरुआती बातचीत में ही लग गए. उन्होंने मुझे ताड़ लिया और मैंने भी उनको नाप लिया."
"हमारी जो दुभाषिया थी, वो साहब जादूगरनी थी. ये बिल्कुल एहसास नहीं होता था कि वो हमारी बातचीत का अनुवाद कर रही हैं. ग़ालिब का मिसरा है... मैंने जाना कि ग़ोया ये भी मेरे दिल में है... उस पर पूरी तरह लागू होता था. कास्त्रो ने बोला, और क्विक फ़ायर अनुवाद हुआ... बिना किसी ग़ल्ती के. फ़िदेल अंग्रेज़ी के कुछ शब्द समझते थे लेकिन जवाब हमेशा क्यूबाई स्पेनिश में देते थे. फ़िदेल के साथ ये नहीं था कि आप पंद्रह बीस मिनट में इंटरव्यू ख़त्म कर दें. आप फंसे तो फिर फंसे. उनसे कोई गुफ़्तगू तीन चार घंटे से कम नहीं हो सकती."

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